“Right to Disconnect” निजी विधेयक लोकसभा में पेश

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Right to Disconnect Bill: लोकसभा में पेश, कर्मचारियों को मिलेगा ऑफिस टाइम के बाद काम न करने का अधिकार

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नई दिल्ली: देश में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए एक बड़ी और ऐतिहासिक पहल के रूप में, लोकसभा में “Right to Disconnect” शीर्षक से एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया गया है। यह विधेयक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की सांसद सुप्रिया सुले द्वारा पेश किया गया, जिसका उद्देश्य कर्मचारियों को कार्यस्थल से जुड़े डिजिटल दबावों से राहत देना और उनके निजी जीवन की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है।

आज के डिजिटल और अत्यधिक जुड़ी हुई कार्य-संस्कृति में, लगातार आने वाली कॉल्स, ईमेल और मैसेज कर्मचारियों को ऑफिस समय के बाद भी कार्य में लगाए रखते हैं। इससे काम और निजी जीवन के बीच की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं, जिससे मानसिक तनाव, थकान और “डिजिटल बर्नआउट” जैसी गंभीर समस्याएँ बढ़ रही हैं। सुप्रिया सुले द्वारा पेश किया गया यह विधेयक इसी बढ़ती चिंता को संबोधित करता है।


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क्या है ‘Right to Disconnect’ विधेयक?

विधेयक का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:

  • कर्मचारियों को ऑफिस आवर्स के बाद,
  • हफ्ते के अंत (वीकेंड) पर,
  • और छुट्टियों के दौरान,

किसी भी प्रकार के काम से जुड़े कॉल, ईमेल या मैसेज का जवाब देने के लिए विवश न किया जाए

यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो कर्मचारियों को कानूनी तौर पर यह अधिकार प्राप्त होगा कि वे निर्धारित काम के घंटों के बाहर अपने वरिष्ठों या कंपनी द्वारा भेजे गए किसी संदेश का उत्तर न दें, और ऐसा न करने पर उनके विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।

Right to Disconnect” का कंपनियों के लिए क्या होंगे नियम?

विधेयक में यह भी प्रस्तावित है कि:

  • सभी कंपनियों को स्पष्ट नीति बनानी होगी कि ऑफिस समय के बाद कर्मचारियों से संपर्क नहीं किया जाएगा।
  • यह नीति कर्मचारियों के नियुक्ति पत्र, एचआर मैनुअल और कंपनी के आचार संहिता में स्पष्ट रूप से दर्ज करनी होगी।
  • यदि किसी विशेष परिस्थिति में संपर्क आवश्यक हो, तो इसके लिए पूर्व निर्धारित दिशानिर्देश और सीमाएं तय की जाएँगी।

यह कदम कर्मचारियों की मानसिक शांति, पारिवारिक समय और स्वास्थ्य की सुरक्षा को ध्यान में रखकर प्रस्तावित किया गया है।


Right to Disconnect” से डिजिटल बर्नआउट को रोकने की कोशिश

नए जमाने की कार्य संस्कृति ने “डिजिटल बर्नआउट\” को एक गंभीर समस्या बना दिया है। कई कंपनियों में कर्मचारियों पर यह अप्रत्यक्ष दबाव होता है कि वे ऑफिस समय के बाहर भी हमेशा उपलब्ध रहें। इससे न केवल तनाव बढ़ता है, बल्कि मानसिक थकावट, अवसाद और कार्यक्षमता में गिरावट जैसे प्रभाव देखने को मिलते हैं।

सुप्रिया सुले का कहना है कि “मानव जीवन सिर्फ काम तक सीमित नहीं हो सकता। परिवार, स्वास्थ्य और निजी समय का संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह विधेयक कर्मचारियों को वह सम्मान और स्वतंत्रता देने की कोशिश है जिसके वे हकदार हैं।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लागू है ऐसा नियम

कई देशों—जैसे फ्रांस, पुर्तगाल, इटली और स्पेन—ने पहले ही “Right to Disconnect” को लागू कर रखा है। इन देशों में कंपनियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य किया गया है कि वे कर्मचारियों को ऑफिस के बाद परेशान न करें। भारत में यह विधेयक पारित होने से देश भी आधुनिक और कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने वाली नीतियों की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाएगा।


क्या होगा कर्मचारियों व कंपनियों पर प्रभाव?

कर्मचारियों के लिए फायदे:

  • मानसिक स्वास्थ्य में सुधार
  • परिवार और निजी जीवन के लिए समय
  • तनाव में कमी
  • उत्पादकता में वृद्धि

कंपनियों पर प्रभाव:

  • एचआर नीतियों में बदलाव की आवश्यकता
  • कार्य-प्रणाली में सुधार
  • बेहतर कार्य-संस्कृति का निर्माण

हालांकि कुछ उद्योगों—जैसे आईटी, कस्टमर सपोर्ट और न्यूज़ मीडिया—के विशेषज्ञ मानते हैं कि “24×7 मॉडल” वाले क्षेत्रों में नए नियमों को लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिर भी, स्पष्ट दिशानिर्देश बनने से स्थिति संतुलित होने की संभावना है।


आगे क्या?

विधेयक को अब आगे संसदीय प्रक्रिया से गुजरना होगा। निजी सदस्य विधेयक के पारित होने की संभावना आम तौर पर कम होती है, लेकिन इस मुद्दे की संवेदनशीलता और जनता में बढ़ती जागरूकता को देखते हुए इसे व्यापक समर्थन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

यदि यह कानून बन जाता है, तो भारत की कार्य-संस्कृति में एक ऐतिहासिक और सकारात्मक बदलाव आएगा, जो लाखों कर्मचारियों की निजी जिंदगी, मानसिक स्वास्थ्य और पेशेवर दक्षता पर गहरा प्रभाव डालेगा।

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